सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में महिलाओं के हक में बड़ा फैसला दिया है। फैसला महिलाओं के बराबरी के दर्जे से जुड़ा है। ऐतिहासिक फैसले से सेना में महिलाओं को स्थायी कमीशन देने की राह खुल गई है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट 2011 में ही यह फैसला सुना चुका है। लेकिन केंद्र ने फैसले के खिलाफ दोबारा अपील की थी।
बराबरी के हक की यह कानूनी लड़ाई 2003 में शुरू हुई थी, जब पहली बार दिल्ली हाईकोर्ट में शॉर्ट सर्विस कमीशन के तहत आने वाली महिला अफसरों ने इसके खिलाफ याचिका दायर की थी। इसके बाद भी अलग-अलग मौकों पर दिल्ली हाईकोर्ट में इससे जुड़ी याचिकाएं दाखिल की गईं।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में महिलाओं को कमांड पोस्ट के भी योग्य बताया है। कोर्ट का यह फैसला उन स्थितियों में आया है जब केंद्र ने महिलाओं की कमजोरी के संबंध में तर्क अदालत में रखे थे। केंद्र सरकार ने अपनी दलीलों में कोर्ट से कहा था- महिलाओं को कमांड पोस्ट इसलिए नहीं दी जा सकती, क्योंकि अपनी शारीरिक क्षमताओं की सीमा की वजह से वे सैन्य सेवा की चुनौतियों का सामना नहीं कर पाएंगी। साथ ही पुरूष अफसर महिला अफसरों की बात नहीं सुनेंगे।
इसके उलट, महिला अफसरों के लिए इस केस को लड़ रही वकीलों ने सेना की महिलाओं की अनेक शौर्य गाथाएं अपने तर्क के रूप में रखीं। वकीलों ने मेजर मिताली मधुमिता, स्क्वाड्रन लीडर मिंटी अग्रवाल सहित कई महिला अफसरों की बहादुरी का जिक्र किया। इस तरह 28 सालों में सेना में महिलाओं की भूमिका को साबित किया।
आखिरकार, सुप्रीम कोर्ट में केंद्र के तर्क कमजोर साबित हुए और महिलाओं के हक में फैसला आया। स्थायी कमीशन मिलने से महिलाएं अब सेना में 20 साल तक नौकरी कर पाएंगी। साथ ही वे पेंशन की भी हकदार होंगी। आज भास्कर 360 में पढ़िए आखिर किस तरह महिला अफसरों ने बराबरी का यह हक हासिल किया। साथ ही इस फैसले का असर क्या होगा।